मुझे सिर्फ बेटा चाहिए Heart touching story of mother and daughters in Hindi

क्या आप मेरे 24 साल लौटा सकते हो? Short Story in Hindi

आज कुछ इनफार्मेशन सर्च करती हुई इस ब्लॉग पर पहुंची और “दिल की बात” सेक्शन मे रानी आहूजा का आर्टिकल पढ़ा| बहुत अच्छा लगा। ये आर्टिकल पढ़ते पढ़ते मझे भी लगा की शायद मैं भी अपने दिल की बात आप सभी से शेयर कर सकती हूँ।

मेरी उम्र 47 साल है| इन सैतालिस वर्षो मे बहुत कुछ देखा और जाना है, एक बात जो सबसे ज्यादा महसूस कि है की कभी कभी आपको वो व्यक्ति ही सबसे ज्यादा दुखी करता है जिससे आप सबसे ज्यादा उम्मीद करते है| मेरी ये छोटी सी कहानी मेरी शादी के बाद शुरू हुई| मुझे आज भी याद है की जब मेरी शादी के बाद मैं अपने हस्बैंड के साथ बहुत सारी उम्मीदों की पोटली बांध कर हवा की तरह उड़ती हुई हनीमून पर मनाली गयी थी और वहां पर बातो बातो मे मेरे पति मुझसे बोले की सुनीता मैं तुमसे जल्दी से जल्दी एक प्यारा सा बेटा चाहता हूँ। मैंने उनकी तरफ देखा और मुस्कराते हुए पूछा की और अगर बेटी हुई तो क्या| मेरा ये प्रश्न मानो मेरे पर पहाड़ बन कर टूट पडा और अचानक उनका व्यहार बदल गया और वो चिल्लाते हुए बोले – बेटी कैसे होगी मैं भी देखता हूँ, मुझे बेटी नहीं चाहिए अगर बेटी हुई तो मुझ से बुरा कोई न होगा। ये सुनकर मैं पत्थर बन गई क्योकि जिस इन्सान के साथ मैं अपना सबसे अच्छा समय एन्जॉय करने के लिए आयी थी वो इन्सान हस्ते हस्ते की हुई बात पर इस तरह से कैसे बोल सकता है| मैं अपने आप को संभाल नहीं पा रही थी क्योकि कुछ समझ नहीं आ रहा की क्या ये मजाक कर रहे थे या ये ऐसे ही है|

शादी तय होने वाले दिन से आज तक इस बात के अलावा इनका व्यहार बहुत ही अच्छा रहा। यहाँ तक की मेरी बड़ी बहन ने जब भी इनसे बात की तो उनको लगा की हर्ष (मेरे पति) से अच्छा कोई इन्सान ही नहीं होगा। लेकिन ये क्या ये तो बिलकुल ही उम्मीद के विपरीत था। इस बात को सोचते सोचते मुझे लगा की ठीक है शायद वो पहला बच्चा बेटा चाहते होंगे और कोई बात नहीं होगी। ये मनाली मे हमारे दूसरे दिन शाम की बात थी और वो पूरी रात रोते रोते कब निकल गयी पता ही नहीं चला। जब सुबह आँख खुली तो घडी मे 7 बजे थे और ये मेरे सामने खड़े मुझे घूरते हुए बोले – जल्दी से तैयार हो जाओ हमारी 11 बजे की बस है, मैंने उनकी तरफ देखते हुए पूछा – आज हम कहाँ घूमने जा रहे है तो उनका जवाब सुनकर फिर से मुझे लगा की ये सब इतना आसान होने वाला नहीं। वो चिल्लाकर बोले – घर , मैंने आश्चर्य के साथ फिर पूछा – क्यों? अभी तो हम 3 दिन और रहने वाले थे| ये सुनते ही वो फिर चिल्ला उठे की तुम्हे बेटी चाहिए न तो मुझे तुम्हारे साथ एक पल भी नहीं रहना| इसके बाद वो चिल्लाते गए और मैंने उनको समझने का प्रयास करती रही| मैंने कहा की मैं ये सभी मेरे हाथ मे नहीं है और मैंने तो सिर्फ पूछा था की बेटी भी हो सकती है और हो भी गयी तो क्या बुराई है? लेकिन ऐसा लगता था जैसे उनके ऊपर कोई भूत सवार हो गया हो और वो कुछ सुनने को राजी न थे| हार गयी थी, टूट गयी थी – कभी सोचा नहीं था की इस बात पर कोई इतना लड़ सकता है| इसके बाद उस दिन हम घर के लिए निकल गए और रास्ते मे कोई बात नहीं हुई |

फिर मैंने अपने आप को समझने की कोशिश की और कहा की ये तो शायद टेम्परेरी गुस्सा होगा और थोड़े दिनों मे सब नार्मल हो जायेगा और हुआ भी ऐसा ही कुछ| 6-7 दिनों के बाद हम सभी अपने कामो मे बिजी हो गए और मझे लगा की सब कुछ नार्मल है| इनका व्यहार भी ठीक ही लग रहा था और फिर कुछ दिनों बाद आयी वो खबर जिस का घर मे सभी को इंतजार था| मैं प्रेग्नेंएट थी और ये बात जैसे ही मुझे पता लगी मैं बेसब्री से हर्ष के ऑफिस से आने का इंतजार  करने लगी और जब शाम को हर्ष घर आये तो मैंने इनको खुश होते हुए खबर सुनाई की मैं प्रेग्नेंट हूँ तो इनके चेहरे पर ख़ुशी देखने लायक थी| हर्ष को खुश देख कर बहुत अच्छा लगा| हर्ष भी ख़ुशी ख़ुशी कमरे से बाहर निकले और बोले माँ सुना हमारे घर मे कोई मेहमान आने वाला है | इसके बाद क्या था, परिवार के सभी सदस्य सासु माँ, ससुर जी, नन्द एवं हम दोनों बैठक मे बैठ कर एक दूसरे को बधाई दे रहे थे| मुझे लग रहा था की मैं उड़ रही हूँ क्योकि माँ बनना ऐसी फीलिंग है जिसे हमेशा सुना था लेकिन आज महसूस कर रही थी तभी मेरी ख़ुशी पर मेरे ससुर जी ने ब्रेक लगाए – उन्होंने कहा की बहु हमे पोता ही चाहिए| मैं उनकी तरफ देखते ही रह गयी लेकिन कुछ बोली नहीं क्योकि मैं अपने पति की नाराजगी पहले भी देख चुकी थी| मैंने सर हिलाते हुए कहा जी पापा जी|

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Mother and Daughter heart touching story

इसके बाद शुरू हुआ नौ महीने का सफर और आखिर वो दिन आ ही गया जब मैं हॉस्पिटल मे अपनी डिलीवरी पैन से लड़ रही थी और उस ख़ुशी का इंतजार कर रही थी जिसकी चाहत हर औरत मे होती है – माँ बनने का इंतजार, एक छोटे से बेबी की माँ। कुछ देर बाद डॉक्टर बच्चे को को हाथ मे लेकर बोली मुबारक हो लक्ष्मी जी आयी है| मैं बहुत खुश थी और बेटी को देख कर सारा पैन भूल गयी, ऐसा लगा मानो मझे सब कुछ मिल गया लेकिन ये इतना भी आसान न था| थोड़ी देर के बाद मुझे और मेरी बच्ची को रूम मे शिफ्ट किया गया| अब तक मेरे परिवार वालो को बेटी होने की खबर मिल चुकी थी और जब वो मेरे कमरे मे आये तो मेरे पति ने सारी हदे पार करते हुए कहा की खुश हो गयी तुम तो ये ही चाहती थी न, मैं कुछ बोल पाती उससे पहले ससुर जी बोले मैंने तो पहले ही कहा था की ये लड़की तेरे लायक नहीं है और बनाओ इसे बहु| मैं ये सब सुन कर दंग रह गयी क्योकि मझे लगा था की बेटी को देख कर उसके पापा और दादा दादी सब खुश होंगे और बेटे की चाहत भूल जायेंगे लेकिन मैं गलत थी क्योकि हॉस्पिटल से आने के बाद सब का व्यहार अलग था| घर आने के बाद से मेरे पति ने मुझे से बात करना ही बंद कर दिया| मेरे से बात करना तो दूर वो अपनी बेटी को हाथ मे लेने को तैयार नहीं थे | एक पत्नी को इस समय मे जिस सपोर्ट की सबसे जयदा जरूरत थी – (पति और घरवालों का साथ) उसके लिए तरस गयी थी मैं | मैंने उन सभी को समझने का बहुत प्रयास किया लेकिन सब बेकार| मुझे तो ये समझ नहीं आ रहा था की बेटी न चाहने का कारण क्या है| ये बात बताने को कोई राजी न था जबकि हर्ष की छोटी बहिन भी लड़की है | पता नहीं क्या कारण था इस नफरत का लेकिन इसका दूसरा पहलु ये भी था की दुनिया के सामने पूरा परिवार खुश होने का अच्छा खासा नाटक कर रहा था|

आज तीन साल की हो गयी थी मेरी बेटी लेकिन परिवार वाले उसको बस एक लड़की के अलावा कुछ नहीं समझते थे| अब तो मेरे परिवार वालो (पीहर) और मैंने इन लोगो को समझना भी बंद कर दिया था| मेरा ससुसराल अच्छा खासा पढ़ा लिखा था लेकिन उसके बाद भी ऐसा व्यवहार, पता नहीं कब बदलेगी ये मानसिकता| तीन साल बाद फिर मझे पता लगा की मैं माँ बनने वाली हूँ तो मुझे कोई खुशी नहीं थी बल्कि अब एक डर था मेरे मन मे की इस बार भी अगर बेटी हुई तो क्या होगा मेरी बेटियों का| लेकिन कहते है न की कभी कभी भगवान भी आपकी पूरी परीक्षा लेने के मूड मे होता है क्योकि मेरी दूसरी भी बेटी हुई| वो दिन था और आज का दिन है इन्होने कभी भी मेरी बेटियों को अपने परिवार मे कोई जगह नहीं दी| अब ये समय था जब मई समझ चुकी थी की मुझे ही अपनी बेटियों के लिए लड़ना पड़ेगा इस दुनिया से क्योकि मेरे अलावा मेरी बेटियों का कोई नहीं था |

इसी वजह से मझे भी कुछ समय बाद नौकरी करनी पड़ी| मै सूरत के अच्छे स्कूल मे टीचर की नौकरी करने लगी क्योकि मेरे पति बच्चियों के लिए कोई पैसा खर्च नहीं करना चाहते थे लेकिन मैं किसी भी तरह से अपनी बेटियों के साथ खड़े रहना चाहती थी और नहीं चाहती थी की उनको कोई कमी हो| मैं मेरी पति को बताये बिना नसबंदी करा ली और उनके बेटे की चाहत ko वही ख़त्म कर दिया| वो मुझे और बेटियों से नफरत भरी निगाहो से देखते है जैसे की हमने कोई गुनाह किया हो| बस वो दुनियादारी के लिए अच्छे व्हवहार का नाटक करते रहे और परिवार की बेसिक जरूरतों को पूरी करते रहे लेकिन क्या जरूरत को पूरी करना ही एक पति का धर्म है वो प्यार जो की बेटियों को अपने पापा से, एक पत्नी अपने पति से चाहती है वो कभी नहीं मिला| मैंने भी अपनी बेटियों के लिए सोच रखा था की उनको इस लायक बनाना है की वो दुनिया को गलत साबित कर सके और खास तौर पर अपने पिता को| मेरी बेटियाँ उस माहौल मे बड़ी हुई जहाँ उन्होंने बेटी होने का दंश झेला था और घर का तंग माहौल देखा था इसलिए उनके मन मे भी अपने आप को प्रूव करने का और कुछ कर गुजरने का जोश था| 

आज मेरा ये पोस्ट लिखने का कारण भी इससे से जुड़ा हैइस वर्ष मेरी छोटी बेटी ने अपना जर्नलिज्म का कोर्स करने के बाद एक अच्छे मीडिया हाउस मे जॉब स्टार्ट की है और बड़ी बेटी तो पहले से ही इंडियन नेवी मे है। मेरी दोनों बेटियों ने अपने आपको प्रूव कर दिया और मुझे उन दोनों को देख कर गर्व महसूस होता है। कुछ दिनों पहले मेरे पति मेरे पास आ कर वो बात बोल गए जो की मैं शादी के बाद मनाली से अब तक सुनने का इंतजार कर रही थी। उन्होंने कहा सुनीता मुझे माफ़ करना मैं गलत था और तुम सही और वो रो पड़े। उनकी आँखे उनका पश्चाताप बता रही थी। मैंने उनका ये रूप पहली बार देखा था और इसकी उम्मीद कतई नहीं थी। हम औरते पता नहीं किस मिटटी की बनी होती है वैसे तो बहुत बात करती है लेकिन मेरे अंदर का इतने सालो का गुस्सा पता नहीं कब मेरे आसुंओ मे बह गया और मैं उनसे एक शब्द गुस्से से नहीं बोल पायी। लेकिन एक प्रश्न जरूर पूछा – क्या आप मेरे 24 साल लौटा सकते हो? 

सुनीता बरोट, सूरत

जरुरी बात – अगर सुनीता जी की ये कहानी अच्छी लगे तो जरुर शेयर कीजिये – धन्यवाद     

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